ज़ियारत-ए-नहिया अल-मुक़द्दसा (Ziyarat-e-Nahiya al-Muqaddasa)
इसमें इमाम हुसैन (अ) की शहादत के आखिरी लम्हों का बहुत दर्दनाक ज़िक्र है। (It mentions the painful final moments of Imam Hussain's martyrdom.) ziyarat e nahiya in hindi
यह पाठ कर्बला के शहीदों, विशेषकर इमाम हुसैन (अ.स.) के प्रति गहरे शोक, मोहब्बत और तौबा का अद्वितीय आलेख है। इसे मुहर्रम के महीने के दौरान, विशेषकर आशूरा और अरबाeen के दिनों में पढ़ा जाता है। ziyarat e nahiya in hindi
"अली बेटा! ज़रा सोचो, जब इमाम हुसैन का वफ़ादार घोड़ा 'ज़ुलजनाह' ख़ाली पीठ लिए, ख़ून से लथपथ होकर ख़ैमों की तरफ़ लौटा होगा, तो कोहराम मच गया होगा! इमाम महदी (अ.स.) फ़रमाते हैं कि जब सैयदा ज़ैनब (अ.स.) ने भाई को ज़मीन पर गिरते देखा, तो उन्होंने अपने सीने को पीट लिया और पुकारा। मासूम बच्चे प्यास से तड़प रहे थे और ज़ालिम ख़ैमों को लूटने के लिए बढ़ रहे थे。" ziyarat e nahiya in hindi
पाठ का तरीका: इसे अक्सर रोते हुए या गमगीन आवाज़ में पढ़ा जाता है। मुहर्रम के महीने में और विशेष रूप से आशूरा के दिन इसे पढ़ने का बहुत सवाब (पुण्य) बताया गया है।
'ऐ मेरे नाना! अगरचे ज़माने की दूरी ने मुझे आपसे दूर रखा और मैं उस दिन आपकी मदद न कर सका, लेकिन मैं सुबह और शाम आपके ग़म में रोता हूँ। और अगर मेरी आँखों के आँसू ख़त्म हो जाएँगे, तो मैं आँसुओं की जगह अपनी आँखों से ख़ून बहाऊँगा!'